Teachers Spotlight - Shri Rajendra Kumar Shukla: A teacher by profession and singer by heart

Teachers Spotlight - Shri Rajendra Kumar Shukla: A teacher by profession and singer by heart

by | Published on | Updated on 2018-04-01 11:14:54


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Recently we had a chance to meet Mr. Rajendra Shukla (Principal - Om Vidya Mandir, Shuklaganj, Unnao), a very disciplined, pleasant and enthusiastic person. A teacher by profession and singer by heart, he has been teaching students since year 1977 till date. Despite teaching, he loves to sing Alha a traditional way of singing of an epic Alha. 

Alha is an oral epic, the story is also found in a number of medieval manuscripts of the Prithviraj Raso and the Bhavishya Purana. There is also a belief that the story was originally written by Jagnik, bard of Mahoba.

 

Education Qualifications:

Name:  Rajendra Kumar Shukla

Educational Qualification: M.A. and B.Ed (Sanskrit)

Current School: OM Vidya Mandir Inter College, Shuklaganj, Unnao, Uttar Pradesh

Primary Education:  Primary School, Bairavan, Raibareilly

 High School  & Intermediate:  Shri Govind Singh Inter College, Rautapur Raibareilly

Grdauation: Kamla Nehru Degree College, Tejgaon, Raibareilly

Post Graduation:  Kanpur University

B.Ed:  Haldia Degree College, Haldia, Allahabad

 

We had a very pleasant and profound talk about many topics, here is a glimpse of our meeting:

 

शिक्षण के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

शिक्षा के क्षेत्र में रुचि प्रारम्भ से थी. गांव में छोटे छोटे बच्चों को शुरू से पढ़ाता आ रहा हूँ. प्रथम से कक्षा आठ तक के बच्चों को मैं दशकों से शिक्षा दे रहा हूँ. साथ ही लोक संस्कृति को समेटे हुए आल्हा गायन भी निरंतर कर रहा हूँ। १९७७ से अध्यन व अध्यापन निरंतर जारी है. बचपन से ही अध्यापक और उपदेशक बनने की चाह थी.  अध्यापक और आलाह गायन ने दोनों ख्वाहिशे पूरी की. 

आज की शिक्षा स्तर एवं तौर तरीको के बारे में क्या सोचते हैं?

पहले की शिक्षा से आज की शिक्षा में गिरावट है. शिक्षा का तात्पर्य मोक्ष से है. देश, समाज, परिवार, संस्कार, संस्कृति, आचरण, पर्यावरण, कहे तो समुचित जीवन जनजाति को अज्ञानता से मोक्ष का रास्ता शिक्षा के गलियारे से ही है. किन्तु आज शिक्षक, अभिभावक और छात्र सभी केवल शिक्षा को धन अर्जित मात्र का साधन समझते है. "या विद्या सा विमुक्तये" इस श्लोक के मायने आज सिर्फ विज्ञापन स्लोगन के लिए रह गए है. १९८६ के बाद से शिक्षा के मूल मायनों में सिर्फ गिरावट होती जा रही है, लेकिन शिक्षा आधुनिक प्रणाली के तहत ऊंचाइयों पर है. आज के बच्चे पहले से ज्यादा तर्कवान, चैतन्य, समझदार व बौद्धिक क्षमताओं से परिपूर्ण है. किन्तु शिक्षा के अर्थ से अज्ञान है. उन्हें शिक्षा के सिर्फ यह मायने पता है की जीवन जीने के लिए शिक्षा महत्यपूर्ण है. किन्तु एक अच्छे समाज के निर्माण में उनकी शिक्षा कैसे योगदान देगी, इससे दूर है. ऐसा नहीं है की अच्छे शिक्षक नहीं है किन्तु एक शिक्षक की शिक्षा और समाज की जिम्मेदारी के आलावा और भी जिम्मेदारियां है. शिक्षक अच्छे समाज का निर्माण करता है यह सत्य है, किन्तु समाज निर्माण में कुछ संसाधनों की जरूरत भी होती है. जो उन्हें कभी प्राप्त नहीं होते. समाज, सरकार सभी अध्यापक से अपेक्षित है, किन्तु उसके कार्य में सहयोग और उसकी समस्याओं को बाटने वाला कोई नहीं. शिक्षक के पास देश निर्माण करने वाली ईंट तो है, लेकिन उसे जोड़कर रखने वाले दूसरे तत्व नहीं है. यही कारण है की देश के तरक्की की दिवार खड़ी होती है और फिर भरभरा कर गिर पड़ती है.

 

कोई एक ऐसे रोचक घटना जो आप हमसे साझा करना चाहेंगे?

वैसे तो यह क्षेत्र रोचक घटनाओं से भरा हुआ है. हर रोज कुछ न कुछ ऐसा होता है जो यादों की किताबों में अपनी जगह बना ही लेता है. जिसने मेरे जीवन को प्रभावित किया मैं एक ऐसे किरदार के बारे में बताना चाहूंगा। वह थे भ्याल बाबा (स्वर्गीय रमा शंकर दुबे बाबा). 1977 की बात है जब मैं सिर्फ पढ़ाने का शौक रखता था. बाबा जी बच्चों को घर में पढ़ाया करते थे वह १० रूपये फीस लिया करते थे. एक दिन वह घर में बच्चों को शिक्षा दे रहे थे. मैं उनके यहाँ किसी काम से गया था. उनको पढ़ाते देख मेरी इक्षाओं ने उफान भरा और मेरे मुँह के रास्ते बाबा जी के सामने आ खड़ी हुई. मैने भ्याल बाबा से कहा- "बाबा मैं भी पढ़ाना चाहता हूँ". फिर क्या था? बाबा जी ने भी अपने मन की बात मेरे मुँह मर दे मारी. कहा- "तेरे जैसे लोग पढ़ा चुके, बच्चों का भविष्य ख़राब कराना होगा जिसे, वो तेरे पास आएगा". मैं छोटा था शायद उन्होंने मजाक में कहा होगा, लेकिन वह मेरे दिल को छू गयी। मैने उसी के बाद पढ़ाना शुरू किया। मैने ५ रूपये में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। धीरे धीरे मेरे यहाँ बच्चों की भीड़ होने लगी. एक वह समय भी आया जब बाबा जी के सारे बच्चे मुझसे पढ़ने आने लगे. बाबा जी की टूशन बंद हो गयी. वह मुझसे बहुत नाराज हो गए. मुझे भी अच्छा नहीं लगा, क्यूंकि मैं यह नहीं चाहता था. मुझे इस बात का आज भी दुःख है. मैं सिर्फ पढ़ाना चाहता था| मैं लगातार उनके सानिध्य में लगातार रहा और उनकी सेवा करता रहा |

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TEACHERS SPOTLIGHT PROGRAM

The role of a teacher in society is both significant and valuable.It has far-reaching influence on the society he lives in and no other personality can have an influence more profound than that of a teacher. Students are deeply affected by the teacher's love and affection, character, competence, and moral commitment. 
Yet teachers don't get their due respect and credit these days. We have started a Teacher Spotlight program where we recognise the effort of these silent and true Heroes of our society and tell their story.

Note: Please send your thoughts/suggestion or concern/complaints to [email protected] 


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